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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 212, Verses 6–7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 212, verses 6–7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 212 · श्लोक 6,7

संस्कृत श्लोक

तद्ब्रह्म घनमाशान्तं चित्त्वाच्चेतत्यहं विदत् । निजं शून्यत्वमन्तस्थं व्योमेव विततान्तरम् ॥ ६ ॥ पवनः स्पन्दनमिव हुताशन इवोष्णताम् । स्वशैत्यमिव पूर्णेन्दुः सत्तामर्थ इवात्मनः ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, सिद्ध, साध्य, यम, ब्रह्मा, विद्याधर, देवताओं तथा अन्यान्य अपूर्व अपूर्व महामहिम प्राणियों के लोकों को प्रत्येक रात में, प्रत्येक दिन में, सामने, पीछे, ऊपर ओर नीचे चूडाला के उपाख्यान में कही गई धारणाओं से देखने से आप देखते हैं और उक्त रीति से न देखने पर नहीं देखते हे