Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 213, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
गुरुरुवाच ।
न विनश्यत एवेदं ततः पुत्र न विद्यते ।
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
तब विद्या-अविद्या-मिश्रदृष्टि में ब्रह्म कैसा चेतता है ? इस पर कहते हैं।
जैसे पवन और स्पन्दन, चन्द्र ओर शीतलता, शून्यत्व तथा आकाश अनन्य स्वरूप (अभिन्नरूप)
हैं, वैसे ही ब्रह्म तथा अहंकार आदि जगत् अभिन्नरूप है अत: वह कब अपने स्वरूप को नहीं चेतता
है ?