Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 213, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
पुराकल्पे हि कस्मिंश्चित्तत्त्वमात्मादिकात्मिका ।
आसीदियं चित्प्रतिभा गुरुशिष्यात्मना वने ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
केवल माया के इतने से अपराध से ब्रह्म अब्रह्म नहीं हो सकता अतएव हिरण्यगर्भ आदि कुछ भी
अन्य था ही नहीं, ऐसा कहते हैं।
ऐसी परिस्थिति में न तो ब्रह्मा उत्पन्न हुआ और न यह दृष्टि का विषय जगत् ही उत्पन्न हुआ, अज
परम ब्रह्म ही पूर्ववत् ज्यों का त्यो स्थित है