Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verse 3
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 213, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
गुरुस्तत्राहमभवं शिष्यस्त्वमभवस्तदा ।
पृष्टवान्मां त्वमग्रस्थ इदमुद्दामधीरधीः ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि हिरण्यगर्भ आदि कुछ भी नहीं था, तो वह संवित् में कैसे स्फुरित होता है ? इस प्रश्न पर
कहते हैं ।
संवित् में जो जगद्रूप भासता है वह प्रातिभासिक ही सत् है उसकी पारमार्थिक सत्ता नहीं है। वह
मृगतृष्णा के समान मिथ्या ही है। दिखाई देने पर भी असत् ही है