Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 213, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 213, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 213 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
शिष्य उवाच ।
सर्वस्य भगवञ्छिन्धि ममेममतिसंशयम् ।
किं नश्यति महाकल्पे किं वस्तु न विनश्यति ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
सृष्टिकाल से लेकर शून्य यह
भ्रान्ति उदित हुई है अथवा वह भी उदित नहीं हुई है। भ्रान्ति कर से है ओर क्या है वह जगत् निर्विकार
ब्रह्म ही हे