Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवाल्मीकिरुवाच ।
इत्युक्तवत्यथ मुनौ नभसो ननाद वर्षामृताभ्रमिव दुन्दुभिरामरो द्राक् ।
शुक्लीकृताखिलककुब्वदना तुषारवर्षोपमा भुवि पपात च पुष्पवृष्टिः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
विस्तारपूर्वक उपदेश देने से हथेली में रखे हुए आँवले के समान साक्षात् कराये गये आत्मतत्व को
जन्मान्तर में स्वयं उपदिष्ट आत्मतत्त्व का ही फिर मैने तुम्हें उपदेश दिया है यों स्मरण दिलाकर-
स्थूणानिकन्न न्याय से दढ करने की इच्छा कर रहे श्रीवसिष्ठजी जगत् के उपकार के लिए
सर्वशास्त्रर्थसिग्रहरूप गुरु शिष्य कथा का शास्त्र के अन्त में मंगलाचरणरूप से उपदेश देते है ।
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे शत्रुनाशक श्रीरामचन्द्रजी, जो विषय (आत्मतत्त्व) आज आपने मुझसे
पूछा है वही विषय अन्य रामावतार में भी आपने मुझसे पूछा था । उस समय भी मैं गुरु ही था ओर
आप शिष्यरूप से ही स्थित थे
सर्ग सन्दर्भ
दो सौ बारहवाँ सर्ग समाप्त दो सौ तेरहवाँ सर्ग गुरु और शिष्य की कथा से श्रीरामचन्द्रजी के पूर्वजन्म के संवाद का वर्णन |