Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verses 13–14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verses 13–14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 13,14

संस्कृत श्लोक

एवमादिभिरन्यैश्च दृष्टान्तैः स्वानुभूतिदैः । अहो नु मार्जिता दृश्यदृष्टिर्भगवता मम ॥ १३ ॥ श्रीराम उवाच । नष्टो मोहः पदं प्राप्तं त्वत्प्रसादान्मुनीश्वर । संपन्नोऽहमहं सत्यमत्यन्तमवदातधीः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल आपातदर्शन से जगत्‌ की सत्ता का निश्चय कर लेना उचित नहीं है, क्योकि शुक्ति में रजत, मरुमरीचिका मे जल आदि बहुत से आपातद्रष्ट पदार्थों की सत्ता नहीं दिखाई देती है, ऐसा कहते हैँ । मृगतृष्णा का (मरुमरीचिका) जल कहाँ स्थिर है यानी अर्थक्रियाकारी है ? (प्यास बुझाने में समर्थ है ?), आकाश में द्विचन्द्र की भ्रान्ति करो स्थिर रहती है यानी वास्तविक हे, आकाश में केशों के गोलो का दर्शन कहाँ वास्तविक हे, भ्रान्ति का अनुभव कहाँ स्थायी रहता है ? हे पुत्र, यह सारा दृश्य केवल भ्रान्तिस्वरूप अतः असन्मय है । स्वप्न में दृष्ट नगर के समान इसका भान होता है अतः यह क्यो न विनष्ट होगा ? असत्‌ के विनाश में क्या आश्चर्य है ?