Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
स्थितोऽस्मि गतसंदेहः स्वभावे ब्रह्मरूपिणि ।
निरावरणविज्ञानः करिष्ये वचनं तव ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसको बाध्य सिद्ध करने में जाग्रत् ओर स्वप्न का परस्पर दृष्टान्तभाव प्रसिद्ध है, ऐसा कहते हैँ ।
यह सर्वात्मना पूर्णरूप से वैसे ही विनष्ट होता है जैसे कि जाग्रत् में सदा और सर्वत्र स्वप्न विनष्ट
हो जाता है अथवा जैसे स्वप्न काल में जाग्रत् विनष्ट हो जाता हे