Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
कथमेतां जनो वेत्ति विना भवदनुग्रहम् ।
विनैव सेतुं पोतं वा बालोऽब्धिं लङ्घयेत्कथम् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे अवयवी का स्वरूप अवयव के भेद से भिन्न-सा होता है वेसे ही स्फुरण ओर
अस्फुरणरूप सृष्टि ओर प्रलय इसके आकाशलक्षण स्वरूप ही हैं