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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verses 21–22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verses 21–22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 21,22

संस्कृत श्लोक

लक्ष्मण उवाच । जन्मान्तरोपचितसंशयनाशनेन जन्मान्तरोपचितपुण्यशतोदितेन । जातोऽद्य मे मुनिवचःपरिबोधनेन जातोऽद्य मे मनसि चन्द्र इव प्रकाशः ॥ २१ ॥ ईदृश्यां दृश्यमानायां दृशि दोषदशाशतैः । काष्ठवद्दह्यते लोकः स्वदुर्भगतया तया ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे स्वच्छ जलवाले तालाब के अन्दर प्रविष्ट हुए यह तुम बिम्ब-प्रतिबिम्ब भेद के क्षय से एक ही हो । तालाब में प्रविष्ट होने के पहले भी बिम्ब-प्रतिविम्बभाव आदि भेदों के स्फुरणो से भी क्षय ओर उदय रहित एक ही थे वैसे ही ब्रह्म भी सृष्टि ओर सृष्टिक्षय में अक्षय एक ही है । जैसे स्वप्न ओर सुषुप्ति में सदा एक ही अक्षय निद्रा रहती है वैसे ही इस सृष्टि में और प्रलय में चित्स्वभाव अविकारी एक ब्रह्म ही है