Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 24
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 24 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 24
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
संपदामथ दृष्टीनां शास्त्राणामापदां गिराम् ।
देशानामथ दृष्टानां दृष्टः सीमान्त उत्तमः ॥ २४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे वत्स, बाधित हुआ अतएव शून्य
नामक वह स्वप्नजगत् दूसरे स्थान में वैसे ही रहता है यह बात बोधदृष्टि से हम नहीं जानते । अन्य
पुरुषों के जीवाकाश में वह रहेगा ऐसी आशंका तो कदापि नहीं करनी चाहिये, क्योकि हमारे चिदाकाश
में ही हमारे वासनामय स्वप्न जगत् का संभव हे । उसे बाधित न भी मानें तो भी दूसरों के चिदाकाश में
उसके गमन का संभव नहीं है, यह अर्थ हे