Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verses 43–46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verses 43–46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 43-46
संस्कृत श्लोक
स्रग्दामतारविगलत्कुसुमासारपाण्डुराः ।
धारापातितविच्छिन्नहारमुक्तास्खलत्पदाः ॥ ४३ ॥
लोलाभरणसाकारं कामं ननृतुरङ्गनाः ।
पेठुः स्फुटपदं विप्रा बन्दिनोऽप्यङ्गनाश्च ताः ॥ ४४ ॥
पपुरुत्ताण्डवं पानं पानपा मदशालिनः ।
भोज्यं बुभुजिरे चित्रं भूषिता भोजनार्थिनः ॥ ४५ ॥
सुधादिपरिलेपेन रञ्जिता गृहभित्तयः ।
रेजू रामेन्दुभानेन पुष्पधूपविलेपनैः ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
बनकर अपने शुद्ध चिन्मात्र स्वरूप को जगत् के रूप में देखता हुआ उन उन उपाधियों मे वस्तुतः निज
निर्विकार रूप से रहने में समर्थ हे