Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verses 37–42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verses 37–42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 37-42
संस्कृत श्लोक
पौरामात्यांस्तथा भृत्यान्दीनान्धकृपणांश्च तान् ।
तस्मिन्दशरथो राजा दिने सह सुहृज्जनैः ॥ ३७ ॥
लब्धसंसृतिसीमान्तश्चकारोत्सवमुत्तमम् ।
तथा नृपगृहे तस्मिन्कौशेयमणिकाञ्चने ॥ ३८ ॥
भूषिते नगरे चैव गीर्वाणनगसुन्दरे ।
ननृतुर्मत्तकामिन्यो विलासिन्यो गृहे गृहे ॥ ३९ ॥
लसद्वंशलताकांस्यवीणामुरजमर्दलम् ।
ताण्डवेनोद्धतारावमन्योन्येतरशेखराः ॥ ४० ॥
क्षुब्धीकृतापणकरभ्रान्तिपल्लविताम्बराः ।
मुग्धाट्टहासविक्षिप्तदन्तेन्दुकिरणच्छटाः ॥ ४१ ॥
मदाकुलितहुंकारा लीलासु तरलस्वराः ।
एकपादतलाघातहेलाहतधरातलाः ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
उसी की सर्वरूप से विद्यमानता का स्पष्टीकरण करते है।
यह स्वयंज्योति स्वयंप्रकाश घडा, पर्वत, वस्त्र, शब्द, तट, गर्त या वटवृक्ष, तृण, अग्नि, स्थावर,
जंगम सब कुछ ही है । अस्ति, (सत्ता) नास्ति (असत्ता), शून्य, क्रिया, काल, आकाश, पृथ्वी, भाव,
अभाव, जन्म, विभूति, नाश, शुभ अशुभ कर्म सब कुछ यही है । वह वस्तु है ही नहीं जिसका आदि,
मध्य तथा अन्त तीनों कालों मे नित्य एक ही चिदाकाश उस तरह का रूप न धारण करता हो | ज्ञानी की
दृष्टि में सब कुछ सब प्रकार से सब जगह सदा इसमें है ओर अज्ञानी की दृष्टि में सब सब प्रकार से सब
जगह सदा इसमें नहीं है ॥३ ३-३ ६॥ हे श्रीरामजी, जब इस प्रकार ब्रह्मात्मक होने से स्वप्नानुभूत नगर
के समान सब कुछ सदा सर्वात्मक ही है तब ब्रह्मरूप होने से तिनका कर्ता है, तिनका भोक्ता है और
तिनका विभु है। घडा कर्ता है, घडा भोक्ता है और घडा सब इन्द्र आदि ईश्वरों का ईश्वर है। वस्त्र कर्ता
है, वस्त्र भोक्ता है और वस्त्र सब ईश्वरों का भी ईश्वर है । द्रष्टा कर्ता है, द्रष्टा भोक्ता है और द्रष्टा सब
ईश्वरो का ईश्वर है। पर्वत कर्ता है, पर्वत भोक्ता है और पर्वत सब ईश्वरों का ईश्वर है। नर कर्ता है, नर
भोक्ता है और नर सब ईश्वरो का ईश्वर है । बहुत क्या कहें सब वस्तुओं में से हर एक कर्ता, भोक्ता
और परात्पर (श्रेष्ठ से भी श्रेष्ठ) हे एवं अनादि (जन्मादिरहित) तथा विनाशशून्य धाता है, क्योकि सव
कुछ ब्रह्यात्मक ही है । भाव यह कि ब्रह्मभाव से दर्शन करने पर तृण आदि सकल पदार्थ अलग अलग सब
कर्ता, सब भोक्ता ओर सब सर्वेश्वर ईश्वर हैँ । ये तिनका, घट, पट आदि प्रत्यगात्मरूप विभुता से विभु
हैँ । जिस रूप में क्षय और नाश प्रतीत (भासित) होते हैं वैसा सब रूप इस प्रकार की विभुतारूपसे ही
स्थित हे