Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
तानि दिव्यानि पुष्पाणि यथास्थानमधःस्थिताः ।
वसिष्ठाय नमस्कृत्वा सभ्याः संशोकितां जहुः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
गुरुजी ने कहा : हे पुत्र, जैसे स्वप्न-
नगर सुषुप्ति अवस्था को प्राप्त हुए आत्मा का आत्मामात्र शेष होकर सम्पूर्णतया शीघ्र विनष्ट हो
जाता हे वैसे ही प्रलय काल में यह सारा दृश्य चिन्मात्र शेष होकर सम्पूर्णतः विनष्ट हो जाता है