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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 6

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 6 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

दशरथ उवाच । अहोऽनुसुविशात्मानः संसारवितताकृतेः । विश्रान्ताः स्मश्चिरं श्रान्ताः शुद्धा मेघा इवाचले ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

प्रलयकाल में समस्त पृथिवी, सब पर्वत, दसो दिशाएँ, क्रिया, काल और क्रम सब कुछ समान रूप से नष्ट हो जाते हैं, कुछ भी शेष नहीं रहता है