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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 50

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 50

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामचन्द्रजी, आप सकल दृश्य पदार्थो से मुक्त हो चारों ओर प्रकाशमान सर्वस्वरूप आत्मा में स्थित होते हुए निरतिशय आनन्द में मग्न अतएव शान्त मतिवाले आकाशकोश के समान मनोहर और वितृष्ण होकर धर्म से राज्य का परिपालन कीजिये