Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 215, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 1
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
ढो सौ तेरहवाँ सर्म समाप्त
दो सौ चोदहवाँ सर्ग॑
श्रीवसिष्ठजी के उपदेश की प्रशंसा, श्रोता लोगों की कृतकृत्यता तथा
कथा के अन्त में हुए स्वर्ग में तथा मनुष्य लोक में महान् उत्सव का वर्णन ।
महान् अध्यात्शार्त्र की समाप्ति होने पर देवताओं तथा मनुष्यो द्वारा किये गये गुरु, ब्राह्मण,
देवता, पितर आदि की वेषभूषा से सजावट, पूजा आदि महोत्सवरूप मंगल का वर्णन करने के लिए
वाल्मीकिजी कहते हैं।
श्रीवाल्मीकिजी ने कहा : हे भारद्वाज, महामुनि श्रीवसिष्ठजी के यह कहने पर उसी समय आकाश
से वर्षा करने के लिए जल से भरे हुए मेघ के समान देवताओं के नगाड़े गहगहाने लगे और आकाश से
भूमि में हिमवृष्टि के समान पुष्पवृष्टि गिरी । उसने तुरन्त सब दिशाओं के मुखों को चारों ओर सफेद
बना दिया