Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 214, Verse 9
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 214, verse 9 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 214 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
संकल्पनवनिर्माणैः स्वप्नदृष्टिजगज्ज्वरैः ।
शुक्तिरूप्यानुभवनैः स्वप्नात्ममृतिदर्शनैः ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
जगत् आत्ममात्र शेष रहकर विनष्ट हो जाता है, ऐसा जो कहा, उसका उपयादन करते है।
अविनाशी चिद्वस्तु के विरवत के विनष्ट होनेपर चिदाकाश ही अवशेष रहता हे ऐसा अनुमान होता
है, क्योकि अपने में अध्यस्त जगत् के अनुभव में हेतुभूत चिदात्मा से ही सर्वप्रपंचशून्य अवशिष्ट
प्रलयकाल सिद्ध होता है । यदि उसका भी प्रलय में नाश मानो तो निःसाक्षिक प्रलय ही सिद्ध न होगा,
यह अर्थ हे