Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verse 22
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 215, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 22
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हिन्दी अर्थ
भगवन्, आपके सदृश महानुभावं के उपदेश
से इस प्रकार की निरतिशय आनन्दप्रकाशरूप आत्मदृष्टि के प्रत्यक्षरूप से दृश्यमान होने पर भी मनुष्य
लोग सर्वत्र प्रसिद्ध अपने दुर्भाग्य से महापुरुषों की सेवा शुश्रुषा से वंचित रहकर राग, द्वेष, अहंकार,
जन्म, मरण आदि सैकड़ों दोषपूर्ण अवस्थाओं से रात दिन काठ के समान जलते हैं यह महान् आश्चर्य
है