Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 215, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 215, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 215 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
यथा पदं पुण्यमनुप्रयाता महानुभावा रघवो विशोकाः ।
वसिष्ठवाक्यप्रसरेण साधो गन्तव्यमाद्यं पदमेवमेव ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
हे मुनिवर, आपके अनुग्रह से आज हमारे पुरुषार्थ की सिद्धि के लिये
अवश्य कर्तव्यकर्म की अवधि पूर्ण हो गई है, यानी हम कृतकृत्य हो चुके हैं आपत्तियों की परम अवधि
(सीमान्त) हम देख चुके हैं, हमने ज्ञातव्य तत्त्व पूर्णरूप से जान लिया है तथा आज हम परम पद में
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