Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 216, Verses 22–23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 216, verses 22–23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 216 · श्लोक 22,23
संस्कृत श्लोक
कृतार्थोऽहं नमस्तेऽस्तु दण्डवत्पतितो भुवि ।
गुरोरुत्तीर्णता केन शिष्याणामस्ति कर्मणा ॥ २२ ॥
कायवाङ्मनसा तस्माच्छिष्यैरात्मनिवेदनम् ।
गुरोरुत्तीर्णता सैव नान्या केनापि कर्मणा ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस समय गुरु द्वारा किये गये परमपुरुषार्थ
देनेवाले ज्ञान के प्रदानरूप परम उपकार का जगत् में ्रत्युपकार न देखकर उनके चरणों में साष्टाग
नमस्कार कर अपने को आजीवन उनकी दासता के लिए समर्पित करते है ।
हे गुरुवर ! मैं कृतार्थ हो गया हूँ आपके सन्मुख भूमि में दण्डवत् पड़ा हू । शिष्य गुरु के उपकार
से (ऋण से) किस प्रत्युपकार द्वारा उऋण हो सकते हैं अर्थात् किसी से भी नहीं हो सकते, इसलिए
शिष्यो को चाहिये मन, वचन और कर्म से गुरु के सन्मुख आत्मसमर्पण कर दें | वही उनका गुरु के
उपकार से निस्तार है । अन्य किसी भी कर्म से गुरुजी के उपकार से निस्तार नहीं हो
सकता