Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 11
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 11 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
परमात्मायते जीवो बुध्यमानस्त्वचेतनम् ।
चेतनं बुध्यमानस्तु जीव एवावतिष्ठते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
संसार अज्ञान का कार्य है ओर तत्वसाक्षात्कार क्षण में ही वह विनष्ट हो जाता है, इन दोनो
बातों का अनुभव कराते हैं
हे श्रीरामजी, यह जीव-जड़ अहंकार, देह आदि को स्वभिन्न जानकर तत्काल ही तद्रूपत्व के
अध्यास-संस्कारों के उद्बोध से उनको आत्मा समझ बैठता है, वह यही इसका संसार है और जब
अपने को सभी उपाधियों से विनिर्मुक्त चैतन्य -स्वरूप समझता है तब यही जीव सम्पूर्ण जगत् के
सारभूत निरतिशय आनन्दरूप होकर बैठ जाता है, यही इसका मोक्ष है (())