Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 14
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 14
संस्कृत श्लोक
ये परां दृष्टिमायाता विधि तेषामपामिव ।
अरूपालोकमननं स्पन्दमस्पन्दनं सदा ॥ १४ ॥
हिन्दी अर्थ
यही कारण है कि तत्त्ववेत्ताओं की चेष्टाएँ अभिमानरहित होने से अस्पन्दकृप ही हुआ करती
हैं; यह कहते हैं।
हे श्रीरामजी, यह आप जान लीजिये कि जो पराद्रष्टि को प्राप्त हो चुके हैं उनकी दृश्य-
दर्शनाभिमानशून्य चेष्टाएँ, जल के नीचे की ओर बहने की नाई प्रारब्ध कर्म का एकमात्र अनुसरण
करनेवाली, अतः वे सदा अस्पन्दरूप ही रहती हैं