Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ये परां दृष्टिमायाता दृश्यश्रीपारदर्शिनः ।
न विद्यमानमप्यस्ति तेषां वेदनमाततम् ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
जेते दग्ध पट का दर्शन पटदर्शनरूप कभी नहीं होता किन्तु भस्मदर्शनरूप ही होता हैं, वैसे ही
बाधित श्य श्री का दर्शन द्ृश्यातीत बलह्मवर्शनरप ही होता है, अतः उनको ब्रैतवेदन नहीं होता,
इस आशय से कहते हैं ।
दृश्य-सौंदर्य के पारदर्शी जो परादृष्टि को प्राप्त हो चुके हैं उन्हें विद्यमान भी विस्तृत दृश्य
प्रपंच का ज्ञान नहीं होता