Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 16
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 16
संस्कृत श्लोक
ये परां दृष्टिमायाता विद्धि तेषामपामिव ।
स्पन्दमस्पन्दनं सर्वमवेदनवशादिह ॥ १६ ॥
हिन्दी अर्थ
द्ृश्यदर्शन के अभाव में भी जल द्ष्टान्त विये यये हैं; इस आशय से कहते हैं ।
हे श्रीरामजी, जो यहाँ ब्रह्मरूपी सर्वोत्कृष्ट दृष्टि को प्राप्त हो चुके हैं, उनका स्पन्दन भी,
जलकी नाई, दृश्यप्रपंच का ज्ञान होने से स्पन्दनशून्य ही रहता है