Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 17
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 17
संस्कृत श्लोक
अरूपालोकमननवेष्टिता मुक्तदामवत् ।
बुधाः कर्मसु चेष्टन्ते वृक्षपत्रेष्विवानिलः ॥ १७ ॥
हिन्दी अर्थ
इम्रीलिए उन्हें कर्मबन्धन के सम्बन्ध का अभाव रहता है, यह कहते हैं /
चूँकि दृश्यदर्शन के अभिमान से वेष्टित वे नहीं होते, इसीलिए मुक्तबन्धन वृषभ के समान वे
सांसारिक कर्मबन्धन के सम्बन्ध से शून्य रहते हैं । तत्त्वज्ञानी पुरुष प्रारब्धानुसार प्राप्त कर्मों में
ऐसी चेष्टा किया करते हैं, जैसे वृक्षों के पत्तों में पवन