Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
ये परां दृष्टिमायाताः संसृतेः पारदर्शिनः ।
न ते कर्म प्रशंसन्ति कूपं नद्यां वसन्निव ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
पारलोकिक कर्मो की अपेक्षा तो उनसे बहुत दूर ही रहती है, इस आशय से कहते हैं ।
जो इस संसार के पारदर्शी महानुभाव सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मदृष्टि को प्राप्त हो चुके हैं, वे कर्मों की
उस तरह प्रशंसा नहीं किया करते, जिस तरह गंगाजी के तट पर निवास करनेवाला कूप की प्रशंसा
नहीं करता