Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 28
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 28 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 28
संस्कृत श्लोक
जीवो जगत्तयात्मानं पश्यत्ययमकारणम् ।
हेमेव कटकादित्वं तदपश्यन्न पश्यति ॥ २८ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे आपाततः भ्रान्ति से सुवर्णपिण्ड में भूत और भावी कटक, केयूर
आदि आकार दिखाई पडते हैं, किन्तु सुवर्णमात्र दृष्टि करने पर दिखाई नहीं पड़ते, वैसे ही यह
जीव बिना कारण के यानी एकमात्र भ्रान्ति से अपने को जगद्रूप से देखता है