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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 29

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 29

संस्कृत श्लोक

जीवन्तोऽपि न जीवन्ति म्रियन्ते न मृता अपि । सन्तोपि च न सन्तीव पारावारविदः शुभाः ॥ २९ ॥

हिन्दी अर्थ

यही कारण है कि जीवन्मुक्त तत्वज्ञानियों की जन्म-मरणादिरुप स्राँसारिक स्थितियाँ अन्य द्रष्ट से विद्यमान रहती हुई भी नहीं ही रहती हैं; यह कहते हैं । इस जगत्‌ के पारावारदर्शी जीवन्मुक्त महापुरुष जीवन धारण करते हुए भी वस्तुतः जीवन धारण नहीं करते एवं मरे हुए नहीं रहते भी वे मरे हुए-जैसे तथा उपस्थित रहते हुए भी नहीं-से रहते प्रतीत होते हैं