Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
प्रबुद्धः सर्वकर्माणि कुर्वन्नपि न पश्यति ।
गृहकर्माणि गेहस्थो गोष्ठभाण्डमना इव ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे घर के अन्दर स्थित भी पुरुष गोशाला आदि में आसक्तचित्त हो
गृह कार्यों को नहीं देखता, वैसे ही ब्रह्म में आसक्तचित्त तत्त्वज्ञानी पुरुष देहयात्रा के निर्वाह के लिए
कर्मों को करते हुए भी उन्हे नहीं देखता