Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
अक्षरन्ध्रप्रणालेन विसृतं वेदनोदकम् ।
व्याप्नोति त्रिजगद्धूमो वियन्मेघतया यथा ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
उसके बाह्म पदार्थों के अवलोकन में द्वार बतलाते हैं /
इन्द्रियों के छिद्ररूपी पनाले से बाहर निकला हुआ आभाससहित अन्तःकरणात्मक ज्ञानरूपी
जल तीनों लोकों में स्थित सन्निकृष्ट बाह्य पदार्थों को ऐसे व्याप्त कर लेता है जैसे धूम्र मेघरूप से
सारे आकाश को