Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
अहमित्येव शुक्रस्था संविदापादमस्तकम् ।
विसरत्यखिले ज्योत्स्ना यथा ब्रह्माण्डमण्डपे ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
उसमें भी, चन्द्रकलाओं के वन्द्रबिम्ब की नाई हृदय में स्थित कीर्यकर्णो के भीतर अहभाव की
रकुर्तियों की विशेषरूप से व्याप्ति होती है और उसके द्वारा सारे शरीर में सामान्यतः अहंभाव का
विस्तार होता है, यह सक अपने एकमात्र अनुभव से ही निद्ध है, यह कहते हैं /
वीर्य कणों के अन्दर स्थित संवित् पैर से लेकर मस्तक तक सारे शरीर में अहंभावरूप से इस
प्रकार व्याप्त हो जाती है, जिस प्रकार सारे ब्रह्माण्डमण्डप में चन्द्रमा की किरण