Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 33
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 33 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 33
संस्कृत श्लोक
कर्मकोशे त्रिकोणे च शुक्रसारेऽवतिष्ठते ।
देहे जीवोहमित्यात्मा स्वामोदः कुसुमे यथा ॥ ३३ ॥
हिन्दी अर्थ
इस प्रकार त्रिकोणाकारोपलक्षित माता के गर्भ में, एकमात्र शुक्र ही,
जिसमें सत् यानी अस्थि, स्नायु आदि कठिनांशरूप से स्थित रहता है ऐसे अपने कर्मों द्वारा
निर्मित शरीर में कोशाकार कृमि की नाई बद्ध होकर भे जीव हूँ” इत्याकारक अभिमान से
युक्तगत इस तरह अवस्थित रहता है, जिस तरह फूलों में सुगन्ध