Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 38
संस्कृत श्लोक
यथास्थितां च निश्चित्तां वर्जयित्वा स्थिरोपमाम् ।
न कयाचिदपि स्थित्या शाम्यत्यहमिति भ्रमः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
॥
ओर उसी कारण से उस जीव का वह अहभाव चित्त की ब्रह्माकार स्थिति के बिना हजारों अन्य
उपायों से भी शांत नहीं होता, यह कहते हैं /
यथास्थित यानी स्वभावसिद्ध चित्तवर्जित स्थिर ब्रह्मैकरसस्थितिरूपी ज्ञानदशा को छोड़कर
और किसी भी दूसरी स्थिति से “अहम् इत्याकारक भ्रम शांत नहीं होता