Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 39
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 39
संस्कृत श्लोक
चिन्तानुचिन्त्यमानापि भावनीयाम्बरोपमा ।
अहंभावोपशमने शमनेन क्रमेण ते ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
इसलिए हे
श्रीरामचन्द्रजी मनन, निदिध्यासन आदि के द्वारा निरंतर चिंतन की जा रही भी अपनी ब्रह्मचिंता
अहंभाव की आत्यंतिक शांति के लिए उत्तरोत्तर भूमिकाओं में निर्विकल्प समाधि के परिपाक
क्रम से चरम भूमिका तक आकाश के समान आपको बना देनी चाहिए । अतः इतने से ही
संतुष्ट होकर आप बैठ मत जाइये