Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 42
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 42 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 42
संस्कृत श्लोक
अहमित्येव शुक्रस्था संविदापादमस्तकम् ।
विसरत्यखिले देहे ब्रह्माण्डेऽर्कप्रभा यथा ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
शुक्रा के सम्बंध के वश से ही समस्त शरीर में अहंभाव का सम्बंध भी रहता है यह कहते हैं /
वीर्यकणों के अंदर स्थित संवित् पैर से लेकर मस्तक तक समस्त शरीर में अहंभाव रूप से इस
प्रकार व्याप्त हो जाती है, जिस प्रकार सारे ब्रह्माण्ड में सूर्य की प्रभा