Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 43
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 43 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 43
संस्कृत श्लोक
दृङनेत्रं स्वदनं जिह्वा श्रुतिः श्रोत्रं भवत्यसौ ।
इत्याद्या वासनाः पञ्च बद्ध्वा तासु निमज्जति ॥ ४३ ॥
हिन्दी अर्थ
चक्षु आदि इन्द्रियों के रूप से तत्-तत् स्थानों में सम्कध भी शुक्रात्मशूत ही जीव का रहता है,
यह कहते हैं /
चक्षु इन्द्रिय ओर चक्षुगोलक, स्वादेन्द्रिय और जिह्नास्थान, श्रवणेन्द्रिय ओर श्रवणस्थान-
इत्यादि सब वीर्य में स्थित वह संवित् ही होती है, इसीलिए रत्री आदि का दर्शन, स्पर्शन, श्रवण
आदि होने पर पहले की रूपादि पाँच वासनाएँ बांध कर समस्त इन्द्रियों के द्वारा जननिक कामोद्दीपन
से उनमें निमग्न हो जाती है