Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
चिद्भावोऽक्षतयोदेति मनो भूत्वैकदेशतः ।
सर्वगोऽपि रसो भूमौ यथाङ्कुरतया मधौ ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
अज्ञानावृत चिति की विपरीत भावना ही सबसे पहले मन
बनती है, फिर वीर्य मे अहंभावरूप एक देश के द्वारा सारे शरीर में व्याप्त होकर तत्-तत् इन्द्रियभाव
से इस तरह उदित होती है, जिस तरह पृथिवी मे सर्वगामी भी रस अंकुर के रूप से वसन्त ऋतु में
उदित होता है