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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 45

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 45

संस्कृत श्लोक

यो भावयति भावेषु नेह रूढेष्वभावताम् । तस्यायत्नवतो दुःखमनन्तं नोपशाम्यति ॥ ४५ ॥

हिन्दी अर्थ

इसीलिए उसके ग्रतिक्रल यथार्थ भावना के बिना उस जीव के दुःखों का उपरम नहीं होता, यह कहते हैं । जो पुरुष इस संसार में उत्पन्न मन, अहंकार, देहादि जगत्‌-पदार्थों में “वाचारम्भणं विकारो नामघेयम्‌ नेह नानास्ति किंचन, अथात आदेशो नेति नेति" इत्यादि श्रुतियों द्वारा दिखलाई गई अभावरूप की भावना नहीं करता, फिर मोक्ष के अनुकूल यत्न से रहित उस पुरुषरूपी गदहे के जन्मादि अनन्त दुःखों की शान्ति कभी नहीं होती