Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 46
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 46 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 46
संस्कृत श्लोक
येन केनचिदाच्छन्नो येन केनचिदाशितः ।
यत्र क्वचनशायीह स सम्राडिव राजते ॥ ४६ ॥
हिन्दी अर्थ
सारे सांसारिक पदार्थों में ब्रह्मरुप की भावना कर रहे पुरुष को तो बाह्य सर्वस्व का त्यागर होने
पर भी प्रार्थ के कारण आक्रष्ट हुए मनुष्यों के द्वारा भोजन, क्र आदि के गिल जाने से तथा
अपने भीतर स्वानन्दामृत-तृप्ति रहने से वैराजपद तक स़ात्राज्य घुस है ही, यह कहते हैं ।
जिस किसीके द्वारा वस्त्र आदि से ढक दिया गया, जिस किसी के द्वारा खिला दिया गया तथा
जहाँ कहीं सो जानेवाला तत्त्वज्ञानी पुरुष सम्राट् के समान शोभित होता है