Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 54
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 54 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 54
संस्कृत श्लोक
सत्तैवैषा विदो यत्सा भवत्युन्मिषिता जगत् ।
परं तत्त्वं निमिषता दृगिवानामकं ततम् ॥ ५४ ॥
हिन्दी अर्थ
और इस तरह स्फटिक पत्थर में
द्रष्टापुरुष की दृष्टि की नाई चैतन्य की जो सत्ता है वही वासनाओं से दीपित होकर जगद्रूप हो
जाती है और वासनाओं के अभाव से निमिषित यानी शान्त हो करके तो अपरिच्छिन्न परमतत्त्व-
मोक्षरूप हो जाती है, जिसका दूसरा कोई नाम ही नहीं है