Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 55
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 55 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 55
संस्कृत श्लोक
दृश्यं विनश्यत्यखिलं विनष्टं जायते पुनः ।
यन्न नष्टं न चोत्पन्नं तत्सद्भवति तद्भवान् ॥ ५५ ॥
हिन्दी अर्थ
उसनिषए एकमात्र चिति की सत्ता ही नित्य है, यह कहते हैं ।
यह सारा दृश्य प्रपंच पहले नष्ट होता है और नष्ट होकर फिर पुनः उत्पन्न होता है ।
परंतु हे श्रीरामचन्द्रजी, जो न तो कभी नष्ट हुआ, न उत्पन्न ही हुआ और सद्रूप है वही आप
हैं