Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 22, Verse 63
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 22, verse 63 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 22 · श्लोक 63
संस्कृत श्लोक
गतभवभ्रमभासुरमक्षयं शममुपेतमुपेक्षितदीपवत् ।
स्थितमपीह जनं जगदीश्वरादनुगतं ननु भाति मुदा च खे ॥ ६३ ॥
हिन्दी अर्थ
भी यह संसार सर्वनियन्ता परमेश्वर की समस्त नियन्त्रण व्यवस्थाओं से तथा भोगप्रीतियों से
अनुगत ही भासता है । कहने का तात्पर्य यह कि यह जगत् भिन्न -भिन्न दृष्टिरूप ही है