Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
विरागवासनापास्तसमस्तभववासनः ।
उत्थाय गच्छ प्रकृतेरस्या मङ्किरिवाङ्कितः ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
(नीरसो भव भावेकु प्र्वेष॒ विभवादिषु' इससे जो कैराग्य की ढता के लिए आवश्यकता बतलाई
गई है उसको खूब स्थिर करने के लिए मकि ब्राह्मण का उपाख्यान आरम्भ करते हैं /
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, भलीभाँति आँखों के सामने दिखाई दे रहे
इस स्वाभाविक अज्ञानादिरूप संसार से तत्त्वबोध द्वारा निकलकर आप मंकि के सदृश उत्तम
लक्षणों से युक्त और वैराग्य की वासना से समस्त सांसारिक वासनाओं से निर्मुक्त होकर
निर्वाण पद को प्राप्त हो जाइये
सर्ग सन्दर्भ
बाईसवाँ सर्ग समाप्त तेईसवाँ सर्ग मरुभूमि के महावन में महाराज वसिष्ठ के साथ मंकिनामक ब्राह्मण का समागम तथा वैराग्य आ जाने से तत्त्वजिज्ञासु हुए उसका उपदेश, यह वर्णन ।