Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
ग्रामे विश्रमणं नैव वर्तते पामरास्पदे ।
तृड्वै लवणपानेन भूय एवाभिवर्धते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
पामरजनों के
निवासस्थान गाँव में (::0) विश्रान्तिसुख नहीं मिलता । हे श्रीरामजी, यह निश्चित है कि नमक का
पानी (५) पीने से तृष्णा ओर बढती जाती है, उससे प्यास नहीं बुझती