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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 22

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 22 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 22

संस्कृत श्लोक

वान्ति भस्मकणाकीर्णा जीर्णाः संशीर्णसद्मसु । तृणपर्णवनव्यग्रा ग्राम्याधार्मिकवायवः ॥ २२ ॥

हिन्दी अर्थ

धुलिधूसर, तृण, पर्णं तथा वन में व्यग्र गाँव में होनेवाले ये अधार्मिक जनरूपी पवन जीर्ण-शीर्ण घरों में संचार करते हैं