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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 36

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 36 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 36

संस्कृत श्लोक

दर्शनादेव मित्रत्वं कुर्वतां महतां पुरः । कमलानीव भूतानि विकसन्त्याश्वसन्ति च ॥ ३६ ॥

हिन्दी अर्थ

अपने दर्शन से ही मित्र बना लेनेवाले (आपके सदृश) महात्माओं के सामने सभी प्राणी, कमलों की नाई, विकसित और आश्वासित हो जाते हैं