Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 23, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 23, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 23 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
पांसुप्रतर्दनहतां प्रकचत्तप्तसैकताम् ।
अदृष्टापारपर्यन्तां क्वचिद्राम किलाङ्किताम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
हे श्रीरामचन्द्रजी, वह महाजंगल अविच्छिन्नरूप से धूलि उड़ने के कारण धूसर हो रहा था,
वहाँ पर तप्त हुई रेत खूब चमक रही थीं, उसका ओर छोर कहीं नहीं दिखाई दे रहा था तथा वह
कहीं-कहीं निकृष्ट ग्रामो से चिहित था