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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 24, Verse 13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 24, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 24 · श्लोक 13

संस्कृत श्लोक

पूर्णापूर्णात्मनि क्षीणाः श्वभ्रकण्टकवृक्षवत् । चिन्ताज्वरविकारिण्यो लक्ष्म्याः खलु महापदः ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

गड्ढे मे उत्पन्न हुए कण्टक वृक्ष की नाई, पुत्र, मित्र, पशु, धन आदि से कभी पूर्ण और कभी अपूर्णं स्वरूप घर में चिन्तारूपी ज्वर से विकार पैदा करनेवाली लक्ष्मी से समुत्पन्न महाविपत्तियाँ मेने निःसन्देह गँवा दीं