Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 13
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध), सर्ग 25, verse 13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 13
संस्कृत श्लोक
द्रष्टृदर्शनदृश्येषु प्रत्येकं बोधमात्रता ।
सारस्तेन तदन्यत्वं नास्ति किंचित्खपुष्पवत् ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि द्रष्टा आदि त्रिपुटी के बोध से आध्यासिक अभेद कड कहे, तो उसके मिथ्याभूत होने से
एकमात्र अधिष्ठान जानेकरसता ही उसमें सिद्ध हो सकती है इस आशय से कहते हैं /
द्रष्टा, दृश्य और दर्शन इन तीनों में प्रत्येक में एकमात्र बोध (ज्ञान) ही सार है, इसलिए उससे
अन्य, आकाश में फूल की नाई, कुछ भी नहीं है